Wednesday, December 10, 2008

An Inspiring Poem (Hindi)

केसरी बाना सजाएँ, वीर का शृँगार कर ।
ले चले हम राष्ट्रनौका को भँवर के पार कर ।। धृ ।।

डर नहीं तूफान बादल का अंधेरी रात का ।
डर नहीं हैं धूर्त दुनिया के कपट का घात का ।।
नयन में ध्रुव ध्येय अनुरुप ही दृढ़ भाव भर,
ले चले हम राष्ट्रनौका को भँवर के पार कर ।। १ ।।

है भरा मन में तपस्वी मुनिवरों का त्याग हैं ।
और हृदयों में हमारे वीरता की आग है ।।
हाथ हैं उद्योग में रत राष्ट्रसेवा धार कर,
ले चले हम राष्ट्रनौका को भँवर के पार कर ।। २ ।।

सिंधु से आसाम तक योगी शिला से मान-सर ।
गुंजते हैं विश्व-जननी प्रार्थना के उच्च-स्वर ।।
सुप्त भावों को जगा उत्साह का संचार कर,
ले चले हम राष्ट्रनौका को भँवर के पार कर ।। ३ ।।

स्वार्थ का लव-लेश, सत्ता की हमें चिंता नहीं ।
प्रान्त भाषा वर्ग का कटू भेद भी छूता नहीं ।।
एक हैं हम एक आशा, योजना साकार कर,
ले चले हम राष्ट्रनौका को भँवर के पार कर ।। ४ ।।

शपथ लेकर पूर्वजों की आश हम पूरी करें ।
मस्त होकर कार्यरत हों, ध्येयमय जीवन धरें ।।
दे रहे युग को चुनौती आज हम ललकार कर,
ले चले हम राष्ट्रनौका को भँवर के पार कर ।। ५ ।।


[This is not my Poem, I have taken this poem from here]

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2 comments:

Mrudula Tambe said...

No reason to mind. Here is one more -

छातीत निर्भय श्वास दे,
साथीस कणखर हात दे।
फुत्कारणार्‍या संकटांना
ठेचणारे पाय दे ।।

ध्येय दे उत्तुंग मंगल
अढळ कैलासापरी ।
कारुण्य निर्मळ वाहू दे
हृदयातून गंगेपरी ।।

दीनदुबळ्या रक्षणा रे,
शस्त्र दे माझ्या करी ।
दु:शासनाच्या दानवी
रुधिरांत धरती न्हाऊ दे।।

निष्पाप जे ते रुप तुझे
उमजूं दे माझे मला ।
धर्म, जाती, पंथ याच्या
तोड आता श्रुंखला ।।

नवीन गगने, नवीन दिनकर,
नवीन चंद्राच्या कला,
या नव्या विश्वात तुझ्या
न्याय नीती नांदू दे ।।

छातीत निर्भय श्वास दे...

Mrudula Tambe said...

Both poems don't belong to me so I do not mind. I have also taken it from somewhere else.

Secondly, I do not mind if someone copies my writing as far as he does not edit it and he does not publish it in his name precisely on the interactive websites like MIPA, UPKRAM.